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हक़ की बातें मेरे हाकिम को बुरी लगती हैं, फिर भी कहता हूँ कि आवाज़ उठा कर देखो माहिष्मती घाट में सजी उर्दू अदब की महफ़िल

मण्डला – महान भारतीय चित्रकार, पद्म विभूषण सैयद हैदर रज़ा की पावन स्मृति में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले तीन दिवसीय “रज़ा स्मृति” समारोह के अंतर्गत बीती रात एक भव्य और गरिमामयी मुशायरे का आयोजन किया गया। इस मुशायरे में देश के विभिन्न शहरों से आए ख्यातिलब्ध शायरों ने अपनी ग़ज़लों से समाँ बाँध दिया। समारोह में पटियाला से आए अमरदीप सिंह, दिल्ली से शहबाज़ रिज़वी, चंदौसी से चराग़ शर्मा और बरेली से आए आशु मिश्रा ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

मुशायरे की शुरुआत निज़ामत कर रहे चराग शर्मा ने बशीर बद्र के इस शेर के साथ की- तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे/मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे। इसके बाद बरेली से आए शायर आशु मिश्रा की नफ़ासत भरी शायरी और संजीदा शेरों ने महफ़िल को एक अलग ही ऊंचाई प्रदान की. उन्होंने कहा- सूखते पेड़ से पंछी का जुदा हो जाना/ ख़ुद-परस्ती नहीं अहसान-फ़रामोशी है। इसी तरह अपनी प्रासंगिक ग़ज़ल “हक़ की बातें मेरे हाकिम को बुरी लगती हैं/फिर भी कहता हूँ कि आवाज़ उठाकर देखो” पर श्रोताओं की ख़ूब तालियाँ बटोरी। इसके बाद चराग़ शर्मा  ने अपनी ताज़ा-तरीन शायरी से युवाओं और वरिष्ठ दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया, उनके शेर -“तुम्हें ये ग़म है कि चिट्ठियाँ नहीं आतीं
हमारी सोचो हमें हिचकियाँ नहीं आतीं”।

इसके बाद एक अलग लहजे के शायर शहबाज़ रिज़वी ने अपने शेर पढ़े-“लहरें आदाब कर के उठती हैं/ कौन बैठा है इस सफ़ीने में।” इसके बाद उनकी नज़्म ‘मरने से ज़रा पहले’ ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। आख़िर में अमरदीप सिंह ने अपनी संजीदा और इंसानी जज़्बात से पिरोई रचनाओं से श्रोताओं की खूब दाद बटोरी- “इस हुनर में नहीं सानी मेरे लोगों का कोई/ राह बन पाए न जब राह की दीवार बनो।” इसके बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध शेर- “इसकी मिट्टी में ही शामिल है बग़ावत का ख़मीर/ कल ये सरदार सर-ए-दार दिखाई देगा” पढ़ कर ख़ूब दाद बटोरी।

मुशायरे की शुरुआत रज़ा साहब की यादों को नमन करने के साथ हुई। मंच पर मौजूद चारों ही शायरों को मण्डला के प्रबुद्ध और संवेदनशील श्रोताओं ने भरपूर सराहना दी। हर शेर पर तालियों की गड़गड़ाहट और ‘वाह-वाह’ की सदाओं से पूरा परिसर गूंज उठा।
आयोजकों ने बताया कि रज़ा साहब अपनी जन्मभूमि और मण्डला की मिट्ठी से बेहद लगाव रखते थे। उन्हीं के विचारों, कला और अदब की परंपरा को जीवित रखने के लिए हर वर्ष इस स्मृति समारोह का आयोजन किया जाता है। मुशायरे के अंत में आयोजकों द्वारा आमंत्रित शायरों का सम्मान किया गया। यह मुशायरा न केवल बेहद सफल रहा, बल्कि कला और साहित्य प्रेमियों के लिए एक यादगार शाम बन गया।

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