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चकौड़¬¬ा के पत्तों में लगी विचित्र बीमारी का वैज्ञानिक दल ने किया निरीक्षण

मडला कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुुख डाॅ. विषाल मेश्राम को दूरभाष के माध्यम जानकारी प्राप्त हुई कि जिले के नैनपुर विकासखण्ड के तालाब टोला क्षेत्र में लगे चकौड़ो के पौधो में विचित्र बीमारी दिखाई दे रही है जिसमें इसकी पत्तियांे के निचले हिस्सों में कालापन दिखाई दे रहा है। सर्वप्रथम इसकी जानकारी दूरभाष के माध्यम से विकास प्रेरक एवं पर्यावरणविद् श्री भास्कर रमन द्वारा प्रदाय की गई इस संबंध में त्वारित कार्यवाही करते हुये कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. विषाल मेश्राम द्वारा केन्द्र में पदस्थ वैज्ञानिकों डाॅ. आर.पी. अहिरवार, डाॅ. प्रणय भारती एवं श्री नीलकमल पन्द्रे की संयुक्त टीम बनाकर तत्काल क्षेत्र का भ्रमण किया गया और आसपास के ग्रामीण, स्थाई निवासी लोगो से चर्चा की। स्थाई ग्रामीणों ने बताया कि इस तरह चकौड़े में जीवन में पहली बार ऐसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं जो अनायास ही लोगो की चिंता का विषय बन गया है। वर्तमान में कोरोना महामारी से गुजरने के पश्चात् ब्लेक फंगस द्वारा उत्पन्न होने वाले गंभीर परिणामों के मद्देनजर रखते हुये लोगो का कयास है कि कहीं इनकी पत्तियों का कालापन भविष्य में मनुष्यों, पशुओं तथा वनस्पतियों एवं पर्यावरण में भी किसी प्रकार की बीमारी का पर्याय तो नही होगा। लोगो के विभिन्न प्रकार के कौतूहलों को विराम देने हेतू केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा चकौड़े के पौधे के सजीव नमूने एकत्रित किये गये हैं। जिन्हें जाॅच हेतू जवाहर लाल नेहरू कृषि विष्व विद्यालय जबलपुर के पौध कार्यिकी विभाग, पौध रोग विभाग एवं कीट रोग विभाग भेजा जाएगा जिससे इसकी वास्तविकता ज्ञात हो सकें। डाॅ. विषाल मेश्राम ने ग्रामीणों से चकौड़ा के पौंधों को लेकर जानकारी दी कि चकौड़ा जिसका वानस्पतिक नाम केसिया टोरा है जिसे सेना तोरा या सिकल तोरा एवं हिन्दी में चकौड़ा, चकवड़ तथा संस्कृत में चक्रमर्द्र के नाम से भी जाना जाता है। जिले के जंगलो, सडक किनारों, मैदानों में वर्षा ऋतु के आगमन पष्चात् यह पौधा निकल आता है। शुरूआत में इसकी जब उंचाई 6 इंच के लगभग होती है तब लोग इसकी भाजी खाते हैं और उनका मानना है कि भाजी के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है। वर्षा काल में होने वाली बुखार जैसी बीमारियों से रक्षा होती है जब इस पौधे में फल्लियां आती है और बीज पक जाते हैं तब इसके बीज की चाय बनाकर पीते हैं वहीं इन बीजो को गर्म तेल में डाल कर ठंडा किया जाता है तो वह तेल औषधिय गुणो भरपूर हो जाता है जो खाज-खुजली के लिए भी बहुत उपयोगी होता हैं। मण्डला जिले से इसके बीज छत्तीसगढ एवं देष के अन्य राज्यो तथा विदेषों जैसे चीन, जापान मे भी विक्रय हेतु भिजवाया जाता रहा है। इसकी बाजार मूल्य 10 रूपये से 50 रूपये तक होने से खेती के अतिरिक्त आय का अच्छा विकल्प रहा है। चक्रमर्द्र के रेचक प्रभाव एंथ्राक्विनोन गलाइकोसाइड् के कारण होते हैं जिन्हें सेनोसाइड्स के नाम से जाना जाता है ये यौगिक आंतों के संकुचन को उत्तेजित करते है जो अपषिष्ट पदार्थ के तेजी से निष्कासन का कारण बनते है चक्रमर्द अधिक पानी को अवषोषित करने और मल मे थोक जोड़ने के लिए बडी आंत की सहायता करके मल को नरम करने में भी सक्षम हो सकता है यह आंत्र आंदोलनों के लिए अनुमति देता है जो जल्दी और चिकनी होते हैं क्योंकि अपषिष्ट बडी आंत से गुजरता है। चक्रमर्द्र परजीवी को नष्ट करने और आंतों के पथ से कीडे़ को निष्कासित करने के लिए एक प्रभावी वर्मीफ्यूज के रूप में भी काम करता हैं। अपच के मामले में चक्रमर्द्र में प्राकृतिक एजनाईम होते हैं जो पेट में गैस्ट्रिक रस स्राव को बहाल करने में मदद करते हैं।

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