मंडला 7 अप्रैल 2022
कृषि विज्ञान केंद्र मण्डला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. विशाल मेश्राम, नीलकमल पंद्रे एवं एफ.ई.एस. से अनुप ठाकुर द्वारा ग्राम औरई में मूंग प्रदर्शन का वितरण किया गया एवं ग्रीष्म कालीन मूंग उत्पादन तकनीक पर कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा संकुल प्रदर्शन – दलहन एवं भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर (उ.प्र.) एवं आदिवासी उपयोजना अंतर्गत ग्रीष्म कालीन मूंग का आंवटन किया गया था जिसे ग्राम औरई माल एवं चंगरिया आदि में मूंग की उन्नत किस्म एम.एच. 421 प्रदाय की गई।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. विशाल मेश्राम ने बताया कि मूंग का उन्नत किस्म एम.एच. 421 एक उन्नत प्रजाति है और ये 60-65 दिनों में ही पककर तैयार हो जाती है जिससे मानसून आने के पूर्व ही कटाई योग्य हो जाने के कारण किसान भाई खरीफ की फसल धान की बुवाई भी समय पर कर सकते हैं। संकुल प्रदर्शन-दलहन एवं भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर (उ.प्र.) की आदिवासी उपयोजना का मुख्य उद्देश्य जिले में दलहन के रकबे को बढ़ावा देना है किसान तैयार उपज को बीज एवं खाने हेतु गांव में ही विक्रय कर सकते हैं जिससे अधिक से अधिक ग्रामीणों में प्रोटीन युक्त भोजन की उपलब्धता हो सके क्योंकि इसमें प्रोटीन बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट खनिज तत्व व विटामिन भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। डॉ. मेश्राम द्वारा प्रशिक्षण में जानकारी दी गई थी कि अच्छी पैदावार हेतु गोबर या कंपोस्ट खाद 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। ग्रीष्म कालीन मूंग की बुवाई कतारों में 20 से 25 सेटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए। केंद्र के वैज्ञानिक नील कमल पन्द्रे ने बताया कि मूंग एक दाल वाली फसल है जो लेग्यूमिनोसी परिवार में आती है। अतः इसमें नत्रजन (यूरिया) की ज्यादा जरूरत नही पड़ती है लेकिन अच्छी पैदावार के लिए 8-10 किलोग्राम नत्रजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटास की मात्रा प्रति एकड़ की दर से बोवाई के समय देना चाहिए। गंधक, सल्फर की कमी वाले क्षे़त्रों में गंधक युक्त उर्वरक 10 किलोग्राम प्रति एकड़ बोवाई के पहले या बोवाई के समय आधार खाद के रूप में देना चाहिए। खेतों में हर तीसरे वर्ष 6-7 क्विंटल गोबर की खाद आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ की दर से डालना चाहिए तथा बुवाई से पूर्व राइजोबियम एवं ट्राइकोडरमा से बीज उपचार अवश्य करें जिससे उगरा, उकटा रोग न लग पाए। प्रशिक्षण के दौरान एफ.ई.एस. से अनुप ठाकुर द्वारा कृषकों को मूंग उत्पादन की वैज्ञानिकों द्वारा दी गई सुझाओं को अपनाते हुये सफल मूंग उत्पादन की बात कही गई।
