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बम बम भोले जयघोष के साथ शिव मंदिर से निकली कांवड़ यात्रा नाचे धर्मप्रेमी भजन संध्या के साथ नंदी महाराज की स्थापना  

                                                              मण्डला। विगत चार वर्षो से आयोजित कांवड़ यात्रा का आयोजन इस वर्ष भी भव्यता से किया गया। शिव कांवड़ आयोजक समिति के द्वारा आयोजित इस कांवड़ यात्रा में सैकड़ो की संख्या में महिला पुरूष और बच्चें शामिल हुए। कांवड़ यात्रा मुन्नीबाई धर्मशाला के सामने स्थित शिव मंदिर में विधि विधान से पूजन अर्चन से की गई। यहां से बलराम चौक, पड़ाव, चिलमन चौंक, बस स्टैंड, ज्ञानदीप स्कूल, नगर पालिका, बड चौराहा अंबेडकर चौक, उदय चौक, सराफा, बुधवारी होते हुए किला घाट स्थित व्यास नारायण मंदिर कांवड़ यात्रा पहुंची जहां पर भगवान भोले नाथ को जल चढ़ाने के साथ पूजन किया गया और कांवड यात्रा का समापन हुआ। कांवड़ यात्रा का नगर के अनेक स्थानों में धर्मप्रेमियों के द्वारा स्वागत किया गया। इसी कड़ी में बुधवारी में समाजिक कार्यकर्ता नीरज अग्रवाल, इंन्द्रेश बब्बल खरया ने कांवडिय़ो में पुष्पवर्षा करते हुए स्वागत किया। वहीं मंदिर प्रांगण में रात्रिकालीन भजन संध्या का आयोजन किया गया जिसमें धर्मप्रेमियों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई। रविवार को प्रागंण में नंदी महाराज की स्थापना कराई गई जहां पर विधि विधान से पूजन अर्चन करते हुए स्थापना हुई।  सामाजिक कार्यकर्ता किशोर रजक ने बताया कि कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों द्वारा सावन के महीने में की जाने वाली एक महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा है। इस यात्रा में भक्त गंगाजल या किसी पवित्र नदी से जल भरकर लाते हैं और उसे अपने क्षेत्र के शिव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा भगवान शिव के प्रति समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार कांवड़ यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला तो भगवान शिव ने उसे ग्रहण किया। विष के प्रभाव से शिवजी को कष्ट होने लगा तब रावण ने कांवड़ में गंगाजल भरकर उन्हें अर्पित किया जिससे उन्हें विष के प्रभाव से मुक्ति मिली। एक अन्य कथा के अनुसार श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को तीर्थयात्रा कराना चाहते थे। उन्होंने कांवड़ में अपने माता-पिता को बैठाकर हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया। यह भी माना जाता है कि श्रवण कुमार पहले कांवडिय़ा थे। कुछ लोगों का मानना है कि भगवान परशुराम ने भी गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव में शिव का जलाभिषेक किया था और यह भी कांवड़ यात्रा की शुरुआत का एक कारण है। अनेक कांवडि़ए यात्रा के दौरान उपवास रखते हैं और दिन-रात शिव का स्मरण करते हैं। मार्ग में सेवा शिविरों में रुकते हैं जहां उन्हें भोजन, दवाई, विश्राम आदि की सुविधाएं दी जाती हैं। कांवडि़ए अक्सर भगवा रंग के वस्त्र पहनते हैं, जो त्याग, भक्ति और तपस्या का प्रतीक होता है। कांवडि़ए अकेले नहीं चलते, वे समूह में यात्रा करते हैं जिससे आपसी सहयोग और एकता की भावना प्रकट होती है। रास्ते में अनेक श्रद्धालु स्वयंसेवक बनकर कांवडिय़ों को भोजन, पानी, प्राथमिक चिकित्सा और विश्राम की सुविधा प्रदान करते हैं। ये वे कांवडि़ए होते हैं जो बेहद तेज गति से दौड़ते हुए जल लेकर मंदिर तक पहुंचते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी पूरी टीम सहयोग करती है। समाज में कांवडिय़ों को भक्ति, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह यात्रा न केवल व्यक्ति को अध्यात्म से जोड़ती है बल्कि एक सामूहिक ऊर्जा और धार्मिक एकजुटता का भी निर्माण करती है। कांवड़ यात्रा से जुड़ी आस्थाएं युवाओं को धार्मिक परंपराओं से जोडऩे में अहम भूमिका निभाती हैं। आधुनिक समय में बड़ी संख्या में युवक इस यात्रा में भाग लेते हैं, जो पारंपरिक श्रद्धा को नई पीढ़ी में जीवित बनाए रखने का कार्य करता है। कई युवा बाइक पर या पैदल, ध्वनि प्रणाली के साथ, उत्सव के रूप में इस यात्रा को करते हैं, जिससे यह एक धार्मिक उत्सव और सामाजिक आंदोलन जैसा रूप ले लेता है कांवडि़ए सिर्फ तीर्थयात्री नहीं हैं, वे भक्ति, सेवा और अनुशासन का जीवंत उदाहरण हैं। उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि आस्था में कितनी शक्ति होती है जो न केवल आत्मा को शुद्ध करती है, बल्कि समाज को भी एकजुट करती है।  शिव कांवड़ आयोजक समिति के गुड्डू ठाकुर, रानू रजक, नेता नंदा, मुन्ना कोष्टा, राजू नंदा, पप्पू साहू, विश्वकर्मा जी, केसर नंदा, सवीता तिवारी, अमित रजक, तुषार चौरसिया, नरेंद्र लहोरिया सहित अनेक शिवभक्त मौजूद रहे।

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