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जनजाति समागम में हुआ अस्मिता संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का राष्ट्रीय आव्हान देश भर से पहुंचे कार्यकर्ता

मण्डला। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजाति समागम में जनजातीय संस्कृति परंपरा आस्था और अस्मिता का विराट राष्ट्रीय प्रतीक दिखाई दिया। देशभर के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों से आए लाखों जनजातीय बंधु-भगिनी पारंपरिक वेशभूषा लोकगीत लोकनृत्य वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इस समागम में सम्मिलित हुए। राजधानी दिल्ली की सडक़ों पर जनजातीय संस्कृति का अद्भुत दृश्य उस समय देखने को मिला जब राजघाट चौक रामलीला मैदान अजमेरी गेट चौक कुदसिया बाग और श्यामगिरि मंदिर सहित विभिन्न स्थानों से विशाल शोभायात्रा प्रारंभ होकर लाल किला मैदान पहुंचीं। लेह-लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक के जनजातीय समाज ने अपनी वेशभूषा लोकधुन मांदर-ढोल पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से भारत की जनजातीय विरासत की जीवंत झलक प्रस्तुत की। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने जनजातीय समाज की आस्था संस्कृति  प्रकृति-पूजा जल-जंगल-जमीन और जीवन-पद्धति को भारत की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि यह समागम आने वाले वर्षों में जनजातीय समाज के महाकुंभ के रूप में स्मरण किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज ने बिना लिखित नियमों के अनेकता में एकता और एकता में अनेकता के मंत्र को जीवन में साकार किया है। समागम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। सदियों से जनजातीय समाज जल जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का मार्ग दिखाता रहा है।

आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है तब जनजातीय जीवन-दर्शन टिकाऊ विकास का प्रेरक मॉडल प्रस्तुत करता है। जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह समागम केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि 75 वर्षों से लंबित उस न्यायपूर्ण मांग की राष्ट्रीय पुनर्पुष्टि है जिसकी प्रतीक्षा आज भी देश का समस्त जनजातीय समाज कर रहा है। कहा कि न्यायालयों ने भी यह माना है कि यदि धर्मांतरण के बाद कोई व्यक्ति अपने समुदाय की परंपराओं सामाजिक आचरण और सांस्कृतिक जीवन-पद्धति से पूर्णत: विच्छिन्न हो जाता है तो उसकी जनजातीय पहचान के प्रश्न का परीक्षण सक्षम प्राधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। परंतु व्यवहारिक स्तर पर प्रत्येक मामले को अलग-अलग सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के समक्ष ले जाना सामान्य जनजातीय व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन और अव्यावहारिक है। इसलिए इस विषय पर स्पष्ट सरल और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता है। जनजाति सुरक्षा मंच ने स्मरण कराया कि अप्रैल-मई 2009-10 के दौरान 26 राज्यों के 293 जिलों और 26,253 गांवों में व्यापक अभियान चलाकर वयस्क जनजातीय सदस्यों से 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए गए थे। इन हस्ताक्षरों को संबंधित जिलाधिकारी और राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को प्रेषित किया गया था। इसके पश्चात 18 जनवरी 2010 को वरिष्ठ जनजातीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति से भेंट कर इस विषय पर शीघ्र निर्णय का आग्रह किया था। मंच ने कहा कि वर्ष 2011 से अब तक ग्राम संपर्क अभियान रैलियां जिला सम्मेलन 21 राज्यों में विभिन्न कार्यक्रम प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड तथा लगभग 450 सांसदों से प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से यह अभियान निरंतर संचालित किया जा रहा है। जनजाति सुरक्षा मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 मई 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से राष्ट्रपति भवन में भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को जनजातीय कल्याण से संबंधित महत्वपूर्ण विधिक एवं संवैधानिक प्रश्नों से अवगत कराया चर्चा तीन प्रमुख मांगों पर केंद्रित रही जिन्हें मंच पिछले दो दशकों से उठाता आया है।

प्रथम लोकुर समिति के मानदंडों के अनुरूप अनुसूचित जनजाति की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा निर्धारित की जाए जो वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं के अनुकूल हो। द्वितीय संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 की भांति संविधान अनुसूचित जनजाति आदेश 1950 में भी आवश्यक संशोधन या स्पष्टीकरण किया जाए  जिससे यह स्पष्ट हो सके कि जो व्यक्ति धर्मांतरण के पश्चात अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था संस्कृति रीति-रिवाजों और जीवन-पद्धति का परित्याग कर देता है उसे अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। तृतीय  जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दीर्घकालीन प्रश्न जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने चंद्रमोहन बनाम राज्य 2004 तथा हाल ही में चिंथदा आनंद बनाम आंध्रप्रदेश राज्य 2026 -283 में भी विचार किया है। मंच ने ध्यान दिलाया कि लगभग 12 करोड़ की कुल जनजातीय जनसंख्या में से अनुमानत: 1.5 से 2 करोड़ व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो चुके हैं और अनेक प्रकरणों में धर्मांतरित जनजातीय व्यक्ति एक ओर अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं तथा दूसरी ओर अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का भी दोहरा लाभ उठा रहे हैं जो संवैधानिक समता और सामाजिक न्याय की मूल भावना के विरुद्ध है। समागम का समापन जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपरागत आस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा हेतु प्रभावी कदम उठाने के राष्ट्रीय आह्वान के साथ हुआ।

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