
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा जिला शिक्षा अधिकारी के मार्गदर्शन में आयोजित इस प्रशिक्षण में शिक्षकों को “आरोग्य-दूत” के रूप में तैयार किया जा रहा है, ताकि वे विद्यार्थियों को किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलावों के प्रति जागरूक कर सकें। किशोरावस्था जीवन का ऐसा चरण है जिसमें बच्चों को कई प्रकार की जिज्ञासाओं और बदलावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में यदि उन्हें सही जानकारी, मार्गदर्शन और व्यवहारिक कौशल मिलें, तो वे अपने वर्तमान को बेहतर बनाने के साथ-साथ भविष्य की दिशा भी सही ढंग से तय कर सकते हैं।
प्रशिक्षण के दौरान जीवन कौशल, पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, मानसिक और भावनात्मक संतुलन, लैंगिक समानता, नशीले पदार्थों की रोकथाम, हिंसा एवं चोट से सुरक्षा तथा सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जानकारी दी जा रही है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ डीपीसी श्री कुलदीप कठल, एपीसी डॉ. शेषमणि गौतम, श्री हेमंत राहंगडाले, आर.के.एस.के. समन्वयक, बीआरसी श्री अनादि वर्मा, समन्वयक (ए.एम.बी.) श्री आर.बी. ठाकुर तथा अनुपमा सोसाइटी के समन्वयक श्री एम.एल. शर्मा की उपस्थिति में हुआ। प्रशिक्षण दो अलग-अलग बैचों में आयोजित किया जा रहा है।
इस अवसर पर डीपीसी श्री कुलदीप कठल ने प्रशिक्षणार्थियों को मार्गदर्शन देते हुए कहा कि शिक्षक विद्यालयों में बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जहां शिक्षण के साथ-साथ जीवन कौशल और स्वास्थ्य शिक्षा भी प्रभावी रूप से दी जा सके। उन्होंने किशोरावस्था में होने वाले बदलावों को समझाने और विद्यार्थियों को सोशल मीडिया व मोबाइल के सीमित और सुरक्षित उपयोग के प्रति जागरूक करने पर भी जोर दिया।
