मंडला – रज़ा स्मृति 2026 में चित्रकला प्रदर्शनी, चित्रकारी, शास्त्रीय गायन, शास्त्रीय नृत्य व लकड़ी में नक्काशी के साथ – साथ साहित्य की महफ़िल भी शुरू हो गई। रज़ा कला वीथिका में चित्रकला प्रदशनी तो चित्रकारी के शौकीन ड्राइंग शीट, गुल्लक, गमले व छातों में पेंटिंग कर रहे है। माहिष्मती में कलाकार लकड़ी में नक्काशी कर रहे है। यहीं शाम को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जा रहा है।

रज़ा स्मृति समारोह के अंतर्गत सोमवार को होटल किंगफ़िशर में ‘साहित्य और प्रकृति’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और आलोचकों ने साहित्य तथा प्रकृति के पारस्परिक संबंधों पर गंभीर विचार व्यक्त किए। सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक चली इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। संगोष्ठी का संचालन करते हुए ध्रुव शुक्ल ने कहा कि प्रकृति में काव्य और सभी कलाएँ समाहित हो जाती हैं। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, अज्ञेय और शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं के उदाहरण देते हुए उनके साहित्य में प्रकृति के विविध रूपों पर बिंदुसार टिप्पणी किया। उन्होंने बताया कि अज्ञेय द्वारा संपादित ‘रूपांबरा संग्रह’ में प्रकृति और काव्य की अत्यंत सुंदर व्याख्या मिलती है। अपने वक्तव्य में उन्होंने यह भी कहा कि अर्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी श्रेणियों की तरह कवियों के भी विविध स्वभाव होते हैं।

विवेक निराला ने कहा कि मानव और प्रकृति का संबंध अत्यंत प्राचीन है। उन्होंने कबीर से लेकर आधुनिक हिंदी साहित्य तक प्रकृति-चित्रण की परंपरा पर प्रकाश डाला। अज्ञेय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि कालिदास के यहाँ प्रकृति मानवीय भावों की संवाहक बनकर उपस्थित होती है। छायावादी काव्य में प्रकृति और मनुष्य के संबंध की चर्चा करते हुए उन्होंने अज्ञेय की कृतियों ‘कतकी पूनो’, ‘बावरा अहेरी’ तथा ‘हरी घास पर क्षण’ भर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज प्रकृति-चित्रण ऐसे चरण में पहुँच गया है कि वह पर्यावरणीय चिंता का रूप ले चुका है और प्रकृति के संरक्षण के लिए सतत प्रयास आवश्यक है। सुमन केसरी ने अपने व्याख्यान में कहा कि खांडव वन का श्राप पूरे महाभारत में फलित होता है। उन्होंने भारतीय और यूनानी साहित्य में प्रकृति के सर्वव्यापी प्रभाव की चर्चा करते हुए मेघदूत और ग्रीक मिथक परसेफ़ोनी का उल्लेख किया। उन्होंने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी तथा मृदुला गर्ग की कहानी के माध्यम से आधुनिक साहित्य में प्रकृति की उपस्थिति को रेखांकित किया।

सदानंद साही ने रामचंद्र शुक्ल के हवाले से वाल्मीकि और कालिदास के साहित्य में प्रकृति के आलंबन रूप का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि ‘संदेश रासक’ हिंदी का ऐसा प्रारंभिक काव्य है जिसमें लोकतांत्रिक संवेदनशीलता महत्वपूर्ण रूप से दिखाई देती है। संगोष्ठी में अष्टभुजा शुक्ल ने भी साहित्य और प्रकृति के संबंध पर अपने विचार रखे।

समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि भारत में आधुनिकता के साथ प्रकृति को देखने का दृष्टिकोण भी बदला। उन्होंने विज्ञान द्वारा प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन का उल्लेख करते हुए मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पंक्ति “चाँद का मुँह टेढ़ा है” का संदर्भ दिया और कहा कि चाँद को इस तरह विश्व के किसी कवि ने नहीं किया। उन्होंने कार्ल मार्क्स के कथन—“आदमी आदमी के साथ जैसा व्यवहार करता है, प्रकृति के साथ भी वैसा ही व्यवहार करता है”—का उल्लेख करते हुए प्रकृति के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी पर बल दिया। उन्होंने कहा कि रामायण मूलतः वध की एक लंबी कथा भी है, जो मनुष्य और प्रकृति के संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। संगोष्ठी में मनीष पुष्कले ने भी प्रकृति और रंगों पर अपने विचार व्यक्त किया।

समारोह के अंत में कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि “कविता मनुष्य के विलाप से जन्मी है।” उन्होंने सभी वक्ताओं एवं उपस्थित श्रोताओं से आग्रह किया कि संगोष्ठी में व्यक्त हुए और जो विचार अभी व्यक्त नहीं हो सके, उन्हें आगे भी निरंतर चर्चा और संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। इस आयोजन में मशहूर चित्रकार अखिलेश जी, साहित्यकार मनोहर जी, कविकुंभ की संपादक रंजीता सिंह, एनडीटीवी से जुड़ीं पूनम अरोड़ा, स्त्री दर्पण पत्रिका से जुड़ी कवि-अनुवादक सुधा तिवारी, कवि शिवांगी गोयल, अमिता शर्मा, प्रियंका सिन्हा तथा अन्य चित्रकारों एवं शिक्षाविदों ने शिरकत की। रज़ा स्मृति 2026 के आगामी सत्रों में भी व्याख्यान, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और कला-केंद्रित संवाद आयोजित किए जाएंगे। यह कार्यक्रम 23 जुलाई तक चलेगा।

रानु चंद्रोल द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त विद्यार्थियों की शानदार प्रस्तुति –
रज़ा स्मृति की सांस्कृतिक संध्या में रविवार की शाम रानू चंद्रोल द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थियों ने नृत्य की अपनी मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। कार्यक्रम में छोटे बच्चों ने गुरु वंदना तथा तीनताल में तोड़े-टुकड़े प्रस्तुत किए। वहीं बड़े विद्यार्थियों ने “नर्मदा अष्टकम” पर भावपूर्ण कथक नृत्य की प्रस्तुति दी। इसके अतिरिक्त एक छात्रा ने “मोहे मारे नजरिया साँवरिया” गीत पर आकर्षक सेमी-क्लासिकल नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों की खूब सराहना प्राप्त की। सभी विद्यार्थियों ने पूरे आत्मविश्वास, अनुशासन और समर्पण के साथ अपनी कला का प्रदर्शन किया, जो उनके निरंतर अभ्यास और उत्कृष्ट प्रशिक्षण का सुंदर उदाहरण रहा। कंचन झरिया, आंचल मरावी, अनुष्का साहू, कृतिका सिंगौर, अवनी, पनवी क्षेतिज, राम धुर्वे ने नर्मदा अष्टक की प्रस्तुति दी। जबकि गुरु वंदना में लंबाशी तेकाम, कायरा गणेश, चिन्मय नामदेव, परिणीति मर्सकोले, स्वर्ण सोनवानी, आनंदी गोलवलकर ने अपनी प्रस्तुति दी।

जगदीश कछवाहा के छात्रों ने दी गायन की मनहोमक प्रस्तुति –

