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रज़ा साहब ने विराम स्थल अपना उद्गम बिंदु को ही चुना – मनीष पुष्कले महान चित्रकार सैयद हैदर रज़ा को जन्म दिवस पर किया गया याद

मंडला – मंडला की माटी में आराम फरमा रहे पद्मा श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित विश्व के महानतम चित्रकारों में शुमार मरहूम सैयद हैदर रज़ा को उनके जन्मदिवस पर कला प्रेमियों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। स्थानीय बिंझिया स्थित कब्रिस्तान में उनकी व उनके पिता सैयद मोहम्मद रजी की कब्र पर रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित रज़ा स्मृति में आए सभी कला कलाकारों व स्थानीय कलाप्रेमियों ने सैयद हैदर रज़ा को चादर पेश कर पुष्पांजलि दी। बता दें कि सैयद हैदर रज़ा का सफर मंडला के ककैया गांव के एक छोटे स्कूल से शुरू हुआ, जहां उनके शिक्षक ने उन्हें एक बिंदु पर ध्यान लगाने को कहा। आगे चलकर यही बिंदु उनकी कला का मुख्य आधार बना। अपनी अनोखी चित्रकला शैली और रंगों के मिश्रण ने उन्हें विश्व पटल पर चित्रकारी के शिखर पर पहुंचा दिया। पेरिस में 50 साल रहने के बावजूद भी वे भारत और विशेष कर मंडला की माटी को कभी नहीं भूले। उनकी मृत्यु के बाद उनकी इच्छा के अनुरूप मंडला स्थित कब्रिस्तान में उनके पिता की कब्र के बगल पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें सुपुर्द ए ख़ाक किया गया। बड़ी संख्या में कलाकारों ने उनके जन्म दिवस पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनकी कला और उनके व्यक्तित्व को याद किया। पूर्व निवास विधायक व जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक मर्सकोले भी कब्रिस्तान पहुंचे और रज़ा साहब को श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

इस मौके पर रज़ा फाउंडेशन से जुड़े वरिष्ठ चित्रकार श्री अखिलेश ने बताया कि यह दसवां साल है रज़ा साहब को हम सब कलाकारों की तरफ से श्रद्धांजलि देने का। इस दौरान रज़ा फाउंडेशन द्वारा मंडला में लगातार युवा कलाकारों के लिए कई प्रोग्राम आयोजित किए जाते रहे हैं। इस वर्ष वाटर कलर का कैंप आयोजित किया गया है जिसमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कलाकार शामिल हुए हैं। साथ हमारी जो कार्यशाला है वह चल रही है। इसमें लोग आते हैं टेराकोटा पेंट करते हैं, चित्र बनाते हैं और उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। उसके साथ ही शाम को सरोद वादन और तबला वादन का प्रोग्राम है। इस तरह से एक नई चेतना मंडला में जागृत की है और उसके प्रति लोगों की रुचिया बढ़ी है, सारी कलाओं के प्रति डांसके लिए, म्यूजिक के लिए और चित्रकला केलिए भी।  लोग आते है, इसमें भाग लेते हैं, बड़े उत्साह से उसमें अपना काम करते हैं। एक जो शुरुआत हुई है, उसके अच्छे परिणाम हमको देखने को मिल रहे हैं।

रज़ा फाउंडेशन से जुड़े एक और वरिष्ठ चित्रकार मनीष पुष्कले के कहा कि यह बिल्कुल सही बात है कि हमारा सौभाग्य है कि ऐसी पीढ़ी जिसने एक तरीके से देश की आजादी के साथ पूरी कला जगत को विकसित किया।  उस पीढ़ी को देख पाना, यह अपने आप में बड़े सौभाग्य की बात है। दूसरी बात यह है कि वह तो रहे पूरे विश्व में लेकिन अंततः उन्होंने अपना विराम स्थल अपना उद्गम बिंदु को ही चुना, अपने इस स्थान को चुना। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी सीख है, हम सभी युवाओं के लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए कि कर आए सब जगह भ्रमण, घूम ले पूरा संसार, पर ना भूले अपनी जड़ों को। यह सबसे बड़ा संदेश है उनके जीवन का, उसको याद रखना चाहिए।

रज़ा साहब के जन्म दिवस पर दिल्ली से खास तौर पर उनके जन्म दिवस पर मंडला पहुंचे उनके प्रशंसक श्री प्रियदर्शी ने कहा कि मैं 50 साल से उनको वॉच कर रहा हूं। मेरा जीवन भी काफी निकल गया लेकिन मुझे अब समय मिला है कि अब मैं उनके सामने, उनके करीब हूं हालांकि उनके विश्राम अवस्था के बाद। मेरा मानना है कि अगर उन्होंने अपना जीवन भारत को दिया है तो फ्रांस को भी दिया है।  वे काम की वजह से वहां रहे, फ्रांस सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित भी किया। मैं चाहता हूं, मेरी मेरी दुआ है कि उनका वहां (फ्रांस) में भी मेमोरियल बने जिससे आने वाली पीढ़ियां सिर्फ हिंदुस्तान की नहीं और जगह की भी, उससे फायदा उठा सके, मेरी यही कामना है और हो सकता है कि मेरी यह इच्छा भी जल्दी पूरी हो।

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