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पलायन से परिवर्तन तक स्वरोजगार ने रोहित की जिंदगी में भरी नई उड़ान

मंडला, 28 फरवरी 2026

जनपद पंचायत निवास के अंतर्गत माइक्रो वॉटरशेड बम्हनी माल एक ऐसा आदिवासी क्षेत्र, जहाँ की शत-प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति है। असंतुलित भौगोलिक परिस्थितियाँ, सिंचाई के साधनों का अभाव और वर्षा आधारित खेती पर निर्भरता ने यहाँ के जीवन को संघर्षमय बना रखा था।

लगभग 95 प्रतिशत किसान केवल बारिश के भरोसे खेती करते थे। मजदूरी के सीमित अवसरों ने युवाओं के सामने एक ही रास्ता छोड़ा था-पलायन। कोई जबलपुर की ओर जाता, तो कोई केरल जैसे दूर राज्यों में रोजगार की तलाश में भटकता।

इन्हीं युवाओं में से एक थे श्री रोहित सिंह कुलस्ते। वे बताते हैं कि परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्हें साल में 6-7 महीने घर से दूर रहकर मजदूरी करनी पड़ती थी। अपनों से दूर, अनिश्चित आय और भविष्य की चिंता-यही उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। शिक्षा और संसाधनों की कमी ने उनके सपनों को जैसे जकड़ लिया था। गाँव में कुछ नया करने का साहस तो था, पर साधन नहीं थे।

फिर उनके जीवन में बदलाव की एक किरण आई। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत वॉटरशेड विकास परियोजना के तहत बम्हनी माल में ‘हाउसहोल्ड सर्वे’ और ‘सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन’ किया गया। इसी प्रक्रिया में रोहित जैसे जरूरतमंद युवाओं की पहचान हुई।

परियोजना के माध्यम से रोहित को स्वयं का व्यवसाय शुरू करने हेतु 44 हजार रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की गई। यह सहायता केवल धन नहीं थी-यह उनके आत्मविश्वास की पुर्नस्थापना थी।

चाट-फुल्की सेंटर बना आत्मनिर्भरता का आधार

 

आज रोहित अपने ही गाँव में चाट-फुल्की सेंटर का सफल संचालन कर रहे हैं। जहाँ कभी वे पलायन को मजबूर थे, वहीं आज वे अपने गाँव में रोजगार का उदाहरण बन चुके हैं।

अब उन्हें प्रतिदिन 250 से 300 रुपए की अतिरिक्त शुद्ध आय प्राप्त हो रही है। यह आय भले ही साधारण लगे, लेकिन उनके परिवार के लिए यह खुशियों का आधार बन चुकी है।

बढ़ी हुई आय से अब रोहित अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में सक्षम हैं। जो जीवन कभी अनिश्चितता से घिरा था, आज वह आत्मनिर्भरता और सम्मान से भरा है।

रोहित इस अवसर के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं सरकारी योजनाओं का सही लाभ मिल जाए, तो गाँव का युवा भी अपने सपनों को साकार कर सकता है। रोहित की यह कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, थोड़ी आर्थिक सहायता और दृढ़ संकल्प मिल जाए, तो पलायन की बेड़ियाँ टूट सकती हैं और गाँव की मिट्टी में ही सफलता के फूल खिल सकते हैं।

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