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महान चित्रक हैदर रज़ा की दसवीं पुण्य तिथि पर दी गई पुष्पांजलि

मंडला – पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्म विभूभूषण से सम्मानित आधुनिक भारत के महान चित्रकार सैयद हैदर रज़ा को उनकी दसवीं पुण्य तिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। स्थानीय कब्रिस्तान में रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित रज़ा स्मृति में पधारे साहित्यकार, चित्रकार, शायर, कवि, कलाकार, मूर्तिकार  के साथ – साथ रज़ा साहब के चाहने वालों ने रज़ा साहब व उनके पिता की कब्र पर फूलों की चादर चढ़ाकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए। बता दे कि सैयद हैदर रज़ा का लगभग 95 वर्ष की आयु में 23 जुलाई 2016 को दिल्ली में निधन हुआ था। उनकी इच्छा के मुताबिक उनके पार्थिव शरीर को मंडला लाकर उनके वालिद की कब्र के बगल में पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द ए खाक किया गया। वर्ष 2010 में पेरिस, फ्रांस से लौटकर दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। पेरिस से लौटने के बाद उन्होंने अपने 14 सोलो शो किए। इनमे 2 शो लंदन और बाकी शो कोलकाता, दिल्ली और मुंबई में हुई। वर्ष 2015 में उन्हें फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1981 में पद्मश्री, वर्ष 2007 में पद्म भूषण और वर्ष 2013 में पद्म विभूषण सम्मान प्रदान किया। शिव नादर विश्वविद्यालय नोएडा और खेरागढ़ विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें मानद डिलीट की भी उपाधि प्रदान की गई थी।

रज़ा साहब की दसवीं पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने मंडला पहुंचे रज़ा साहब के मित्र सेवानिवृत आईएएस अधिकारी, प्रख्यात लेखक, कवि व रज़ा फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी ने रज़ा साहब को याद करते हुए कहा कि आज रज़ा साहब को गए 10 वर्ष हो गए। पूरा एक दशक बीत गया। भले उनका भौतिक शरीर यहां दफन है लेकिन रज़ा साहब अपनी कलाकृतियों में, लोगों को उन्होंने जिस तरह की प्रेरणा और ऊर्जा, साहस दिया उसमें हमेशा जीवित रहेंगे। इस बीच उनकी विश्व प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। उनकी कला का भारत में विशेषता, यूरोप और अमेरिका में भी आकलन बेहतर हुआ है। वह जो चाहते थे वह संगीत, हो नृत्य हो, रंगमंच हो, विचार हो, में युवाओं को प्रोत्साहित करना मुख्य उद्देश्य होना चाहिए रज़ा फाउंडेशन का। तो हम लोगों ने पिछले 10 वर्ष में ये प्रयत्न किया है और मंडला में भी जहां की वह थे, जहां उनका बाल काल बीता, जहां पहली बार उन्होंने महात्मा गांधी को देखा। उस मंडल में भी धीरे-धीरे यहां के सांस्कृतिक कैलेंडर पर अब रज़ा साहब की जगह बन रही है तो हमारे लिए संतोष की बात है।

रज़ा स्मृति में बतौर साहित्यकार मंडला पहुंचे मंडला के पूर्व कलेक्टर जगदीश जटिया ने रज़ा साहब को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि आज रज़ा साहब की दसवीं पुण्यतिथि पर हम सब लोग एकत्रित हुए हैं। रज़ा साहब की स्मृति में आज से 25 वर्ष पहले रज़ा साहब के मौजूदगी में ट्रस्ट बना था और वह रज़ा फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है। रज़ा साहब ने उस ट्रस्ट को समृद्ध किया। अपनी सारी  कमाई उसमें दी और उस ट्रस्ट के माध्यम से पूरे देश में साल भर में 70 से अधिक कार्यक्रम होते हैं और केवल साहित्यिक नहीं होते, विभिन्न प्रकार की कलाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। जो जितनी भी कलाएं हैं, सभी कलाओं को प्रोत्साहित करते हैं। नए लोगों को प्लेटफार्म मिलता है और उसके पीछे रज़ा साहब का सोच – मकसद यही था कि मैं ऐसा करूं क्या आने वाली पीढ़िया कुछ सीखें और कोई भी आगे अपना नाम कमाये। तो उनकी स्मृति में हम लोग सब इकट्ठा होते हैं और बातचीत होती है और साल भर की गतिविधियां भी बताई जाती है, एक अच्छी चीज है। और जहां तक मंडला का सवाल है तो मंडला में साल में दो गतिविधि है। हम रज़ा साहब की जन्म तिथि पर और पुण्य तिथि पर करते हैं। उसके अलावा बीच में लगातार शिविरों के माध्यम से चाहे वह काष्ट कला हो, मूर्ति कला हो, पेंटिंग हो या अन्य प्रकार की गतिविधियों को यहां अंजाम देते है। मकसद यही है कि चूंकि रज़ा साहब की यह जन्म भूमि – कर्मभूमि रही है, बच्चों को कुछ न कुछ प्लेटफार्म मिले वो आगे बढ़े।

देश के जाने माने शायर चराग शर्मा ने रज़ा साहब को खिराज ए अकीदत पेश करते हुए कहा कि शायर और पेंटर के बीच सबसे आसान रस्सी बांधी जाती है वह कला की है। यह रिश्ता तो हमारा कोई भी मौत जिंदगी का रिश्ते से बढ़कर है। रज़ा साहब की पेंटिंग्स का जो शायरी से रिश्ता है वह उस पे हम बात बढ़कर कर सकते हैं। शायरों के लिए जो तंज़ीम काम कर रही है वो अक्सर वो तंजीमें भी नही कर रही है जो शायरी के लिए काम करने का दावा करती है।रज़ा सहाब की पेंटिंग्स ने एक नस्ल को, एक जनरेशन को मुतासिर किया है। हम भी उन लोगों में से है। उनकी तस्वीरों के जो रंग है वो अमूमन ग़ज़लों के लफ़्ज़ों से ज्यादा रौशन, मुनव्वर और ताबनाक है। तो हम इस बात से सबक लेते हैं सीख लेते हैं।

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