मण्डला 24 अक्टूबर 2021
एकीकृत या समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन एक ऐसी विधि है जिसमें कार्यनिक (कैंचुआ खाद, गोबर खाद या कम्पोस्ट खाद आदि) अकार्बनिक (रासायनिक उर्वरक जैसे- यूरिया, डीएपी आदि) एवं जैविक स्त्रोतों औरो जैव उर्वरक (राइजोबियम, पीएरावी, कल्चर आदि) के मिश्रित उपयोग द्वारा पौधों को उचित एवं संतुलित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध करवाये जाते हैं। पौधों की उचित वृद्धि, अधिकतम उत्पादन, स्वस्थ मृदा एवं मृदा की उर्वरता एवं उत्पादन क्षमता बनाये रखते हुए लम्बे समय तक टिकाउ उत्पादन प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्वों की मृदा में उपलब्धता अति आवश्यक है। वर्तमान में अधिकांश किसानों द्वारा केवल यूरिया एवं डीएपी उर्वरक का ही फसलों में उपयोग किया जा रहा है, जो केवल नाइट्रोजन (एन) फारफोरस (पी) तत्व की ही आपूर्ति करते हैं। इन्हीं दो उर्वरकों के लगतार प्रयोग से मिट्टी में पोटाश (के) एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे – जिंक जेडएन, आयरन एफओ, सल्फर एस एवं बोरान बी) की कमी आ गई है। पोटाश एक प्रमुख पोषक तत्व है, जिसका फसल के स्वास्थ्य एवं अनाज की गुणवत्ता से सीधा सम्बन्ध है। पोटाश के प्रयोग से पौधा में रोग एवं कीट प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है, जिससे वह रोग एवं कीट रो कम प्रभावित होता है एवं दानों में चमक आती है। अतः किसानों को पोटाश तत्व की आपूर्ति के लिए म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) उर्वरक का प्रयोग भी करना चाहिए। वर्तमान में बहुत से कॉम्पलेक्स उर्वरक जैसे- 12:32:16, 10:26:26, 14:35:14 आदि उपलब्ध है, जिसमें नाइट्रोजन, फारफोरस एवं पोटाश तीनों तत्व पाये जाते हैं। साथ ही फसल बोते समय इन कॉम्पलेक्स उर्वरकों का उपयोग में भी आसानी रहती है जबकि यूरिया डीएपी एवं पोटाश का पृथक-पृथक प्रयोग में व्यवहारिक कठिनाई होती है। अतः किसानों को फसल बोते समय यूरिया, डीएपी की जगह इनकॉम्पलेक्स उर्वरकों का उपयोग भी करना चाहिए। इन तीन मुख्य पोषक तत्व के अलावा द्वितीयक पोषक तत्व सल्फर, मैग्नीशियम एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का पौधों की वृद्धि, पुष्पन एवं फलन से सीधा सम्बंध होता है। अतः इन तत्वों की पूर्ति के लिए आवश्यक उर्वरकों का प्रयोग प्रत्येक फसल वर्ष में किया जाना चाहिए।
सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक की आपूर्ति के लिए. जिंक सल्फेट 10 कि.ग्रा., एकल, आयरन की पूर्ति के लिए फेररा सल्फेट 20 किग्रा, प्रति एकड तीन वर्ष में एक बार, सल्फर की आपूर्ति के लिए घेन्टोनाइट सल्फर 10 किग्रा, एकड़ या डीएपी की जगह एसएसपी का प्रयोग जिसमें 11 प्रतिशत सल्फर होता है, वोरान के लिए योरेवरा 4 किग्रा, एकड़ा जैव उर्वरक- चना, मसूर, सोयाबीन, तुअर, मूंग एवं उड़द आदि के लिए राइजोबियम कल्वर 1 ली. पीएसबी कल्चर 1 ली. एवं जैविक फफूंदीनाशक (उगरा रोग के लिए) ट्राइकोडर्मा 1 ली. को 100 किग्रा गोबर खाद में मिलाकर भूमि उपचार करें। उपरोक्त कल्चर रो भूमि उपचर हेतु बोनी के 5-7 दिन पूर्व छायादार रथान में 100 से 200 किग्रा अच्छी राड़ी हुई गोबर खाद में सभी कल्चर मिलाकर तथा पानी सींचकर मिला दें एवं गीले जूट को बोरे से ढ़क दें तथा 2-3 दिन याद पुनः पानी सीच दें तथा बोनी के तुरंत पूर्व खेत में मिला दें। गेहूं, धान हेतु एजोटोयेयटर कल्चर एवं गन्ना, मक्का एवं ज्वार हेतु एजोरिपलम कल्चर 01 ली. एवं पीएसबी कल्चर की 01 ली. मात्रा को उपरोक्तानुसार प्रयोग करें। उपरोक्त विधि से रयूडोमोनास फ्लोरसेन्स एवं वैम कल्चर से भी भूमि उपचार किया जा सकता है। 02 टन प्रति एकड़ केचुआ खाद या 05 टन प्रति एकड़ गोबर खाद, कम्पोस्ट खाद का प्रयोग कर, रासायनिक उर्वरकों की मात्रा को 25 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। जैव उर्वरकों के उपयोग से जहां वायुमंडलीय नाइट्रोजन का भूमि में स्थरीकरण होता है वहीं पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। कार्यनिक उर्वरकों के प्रयोग से मृदा की पैदावार क्षमता लम्बे समय तक कायम रहती है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ जाती है, जिससे कम उर्वरकों के उपयोग से भी अधिक पैदावार होती है। मृदा की संरचना में सुधार होता है, जल धारण क्षमता बढ़ जाती है। जैव उर्वरकों एवं कार्यनिक उर्वरकों के प्रयोग से कई तरह के एन्जाइम सक्रिय हो जाते है, जिससे फसलों की पैदावार एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है। अतः रासायनिक उर्वरकों के संतुलित तथा कार्बनिक एवं जैविक उर्वरकों के समन्वित उपयोग से टिकाउ रूप से कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
