मंडला, 6 नवंबर 2025
“जहां चाह, वहां राह” इस कहावत को सच कर दिखाया है ग्राम लावर के किसान धर्मपाल सिंह ने। आठ वर्ष पूर्व उन्होंने उद्यानिकी विभाग की हल्दी प्रदर्शन योजना के तहत परंपरागत खेती में बदलाव कर हल्दी की खेती शुरू की थी। आज उनकी मेहनत और नई सोच ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है।

उद्यानिकी विभाग के सहयोग से हुई शुरुआत
वर्ष 2017 में उद्यानिकी विभाग की ओर से धर्मपाल सिंह को कर्नाटक हल्दी के 250 किलोग्राम बीज और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया गया। उन्होंने अपनी 1.5 एकड़ भूमि पर हल्दी की खेती का प्रयोग किया। पहले ही वर्ष उन्हें अच्छा उत्पादन मिला, जिसके बाद उन्होंने स्वयं का बीज तैयार कर हर साल हल्दी की फसल लेना जारी रखा।
धर्मपाल सिंह बताते हैं कि, “विभाग की मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से मुझे खेती में नया रास्ता मिला। अब हल्दी से ही स्थायी आमदनी हो रही है।”

फलदार पौधों से मिला दोहरा लाभ
कृषक ने बताया कि हल्दी छायादार क्षेत्रों में अधिक उत्पादन देती है। उद्यानिकी विभाग के सुझाव पर उन्होंने खेत में आम और नींबू के पौधों का रोपण किया है। इससे हल्दी की फसल को आवश्यक छाया मिलती है और सीजन में फलों की बिक्री से अतिरिक्त आमदनी होती है।
जैविक खेती से बढ़ी मांग और कीमत
धर्मपाल सिंह पूरी तरह जैविक पद्धति अपनाते हैं। फसल लगाने से पहले वे केवल गोबर की खाद का उपयोग करते हैं, किसी भी रासायनिक उर्वरक का नहीं। उनकी जैविक हल्दी की मांग जबलपुर सहित आसपास के बाजारों में लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में उन्हें 90 से 95 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कीमत मिलती है। 1.5 एकड़ भूमि से वे प्रति वर्ष 15 से 18 क्विंटल हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं, जिससे उन्हें स्थायी आमदनी प्राप्त हो रही है।
नई तकनीक अपनाएं, सफलता निश्चित है
धर्मपाल सिंह का कहना है यदि किसान शासन की योजनाओं का लाभ लें और नई तकनीक को अपनाएं, तो छोटी भूमि से भी आत्मनिर्भर बना जा सकता है। उनका यह प्रयास न केवल ग्राम लावर बल्कि पूरे जिले के किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गया है।
