मंडला, 10 जून 2026
आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को संजोए रखने वाले माटी कला के कुशल शिल्पकार श्री बलराम चक्रवर्ती से कलेक्टर श्री राहुल नामदेव धोटे ने उनके निवास पर पहुँचकर आत्मीय मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने चक्रवर्ती द्वारा वर्षों से संरक्षित और विकसित की जा रही पारंपरिक माटी कला को नज़दीक से देखा तथा उनके अनुभवों को सुना। इस दौरान सहायक कलेक्टर श्री शैलेन्द्र चौधरी, एसडीएम मंडला श्रीमती सोनल सिडाम, सीएमओ नगरपालिका श्री गजानंद नाफड़े सहित संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

मुलाकात के दौरान श्री बलराम चक्रवर्ती ने मिट्टी से घी रखने के लिए उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक पात्र का निर्माण कर उसकी विशेषताओं से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में भोजन, अनाज, घी और अन्य आवश्यक वस्तुओं के भंडारण के लिए मिट्टी के विभिन्न प्रकार के बर्तनों का उपयोग किया जाता था, जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल थे बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माने जाते थे।

कलेक्टर श्री धोटे ने कहा कि हमारी परंपराएं और लोक कलाएं केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे सभी पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों और उनके उपयोग की विस्तृत सूची तैयार की जाए, ताकि उन्हें संरक्षित करने और आमजन तक पहुंचाने के लिए प्रभावी प्रयास किए जा सकें। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के साथ समन्वय स्थापित कर इन उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग, ब्रांडिंग और पहचान दिलाने के लिए कार्य किया जाए। इससे न केवल माटी कला को नया जीवन मिलेगा, बल्कि इससे जुड़े कलाकारों और कारीगरों को भी रोजगार एवं आय के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम पुनः उन पारंपरिक वस्तुओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, जो प्रकृति और संस्कृति दोनों से हमारा जुड़ाव मजबूत करती हैं।

इस अवसर पर श्री बलराम चक्रवर्ती ने कहा कि वे माटी कला की इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। उन्होंने बताया कि यदि स्थानीय कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए बेहतर मंच और अवसर उपलब्ध हों तो न केवल यह कला जीवित रहेगी, बल्कि नई पीढ़ी भी इससे जुड़ने के लिए प्रेरित होगी।
यह मुलाकात केवल एक कलाकार और प्रशासनिक अधिकारी के बीच संवाद भर नहीं थी, बल्कि मिट्टी से जुड़ी उस सांस्कृतिक चेतना को सम्मान देने का प्रयास थी, जिसने सदियों से भारतीय जीवन शैली को आकार दिया है। मिट्टी की सोंधी खुशबू, परंपराओं की गरिमा और लोक कला के प्रति सम्मान का यह भाव कलाकारों के लिए नई उम्मीद और उत्साह लेकर आया।

