मंडला, 14 जून 2026
राज्य शासन द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने और पर्यावरण अनुकूल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के प्रयासों के जमीनी परिणाम अब दिखने लगे हैं। मंडला जिले के विकासखंड बिछिया के ग्राम घुघरी के निवासी श्री राजेंद्र सिंह पन्द्रे आज क्षेत्र के प्रगतिशील और सफल कृषकों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। ग्रामीण परिवेश से जुड़े स्नातकोत्तर (एम.ए.) शिक्षित राजेंद्र सिंह ने पारंपरिक सोच से हटकर नौकरी की बजाय कृषि को अपनाकर आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश की है।

कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना का मिला संबल
शुरुआत में पारंपरिक खेती करने वाले राजेंद्र सिंह ने कृषि विभाग तथा आत्मा परियोजना के अधिकारियों से संपर्क किया। आत्मा योजना के विकासखंड तकनीकी प्रबंधक श्री ओमवीर सिंह रघुवंशी के तकनीकी मार्गदर्शन और समय-समय पर किए गए फील्ड विजिट से राजेंद्र सिंह का दृष्टिकोण बदला। उन्होंने विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर जैविक खेती, उन्नत बीज चयन, पोषक तत्व प्रबंधन तथा कीट नियंत्रण की आधुनिक व वैज्ञानिक तकनीकों को सीखा।
सुपर फूड की खेती और लागत में कमी
राजेंद्र सिंह ने अपने खेतों में नवाचार करते हुए पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली चिया सीड एवं किनोवा जैसी सुपर फूड फसलों की खेती प्रारंभ की। उन्होंने जीवामृत, जैविक खाद, बहुफसली एवं मिश्रित खेती प्रणाली को अपनाया, जिससे रासायनिक खादों पर होने वाला उनका खर्च लगभग समाप्त हो गया। खेती की लागत कम होने और उत्पादन बढ़ने से उनकी कृषि आय में दो गुना तक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

बी.आर.सी. की स्थापना और 400$ किसानों को मार्गदर्शन
श्री राजेंद्र सिंह पन्द्रे की क्षमता को देखते हुए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत उनके यहां बायो रिसोर्स केंद्र की स्थापना की गई है। इस केंद्र के माध्यम से वे स्वयं के उपयोग के साथ-साथ क्षेत्र के अन्य किसानों को भी जीवामृत, नीमास्त्र जैसे जैविक इनपुट व उत्पाद उपलब्ध करा रहे हैं। वर्तमान में वे नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के तहत मास्टर ट्रेनर के रूप में अपने गांव के लगभग 125 किसानों सहित बिछिया विकासखंड के विभिन्न क्लस्टरों के 300 से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देकर स्वावलंबी बना रहे हैं।
कटाई से पहले ही बिक जाती है उपज
प्राकृतिक और शुद्ध पद्धति से उगाई गई उनकी फसलों की मांग बाजार में इस कदर है कि अब उन्हें अपनी उपज बेचने मंडी नहीं जाना पड़ता। उनकी फसल कटाई से पूर्व ही अच्छे दामों पर बुक हो जाती है। हाल ही में उन्होंने प्राकृतिक पद्धति से उत्पादित गेहूं को 2600 से 2700 रुपये प्रति क्विंटल के प्रीमियम भाव पर विक्रय किया है, जो सामान्य बाजार दर से काफी अधिक है।
जिला स्तर पर हुए सम्मानित
उत्कृष्ट कृषि पद्धतियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान के लिए राजेंद्र सिंह को आत्मा योजना के अंतर्गत प्रगतिशील कृषक के रूप में सम्मानित भी किया जा चुका है। उनकी इस सफलता में उनकी कड़ी मेहनत, नवाचार और परिवार के सहयोग के साथ-साथ शासन की कल्याणकारी योजनाओं का बड़ा योगदान रहा है।
राजेंद्र सिंह कहते हैं मेहनत, नवाचार और प्राकृतिक खेती का संगम ही सफलता की असली पहचान है। यदि सही मार्गदर्शन और नई तकनीक को अपनाया जाए, तो कृषि को आत्मनिर्भरता और समृद्धि का सबसे मजबूत आधार बनाया जा सकता है।
आज श्री राजेंद्र सिंह पन्द्रे की यह सफलता की कहानी मंडला जिले ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के युवा किसानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हुई है।
