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जल गंगा संवर्धन अभियान : दीपों से जगमगायी प्राचीन बावड़ी     जन अभियान परिषद् ने किया बावड़ी उत्सव का आयोजन

                                             कलेक्टर श्री सोमेश मिश्रा एवं सीईओ जिला पंचायत श्री श्रेयांश कुमट के मार्गदर्शन में जल गंगा संवर्धन अभियान अंतर्गत मध्यप्रदेश जन परिषद मंडला द्वारा महाराजपुर संगम घाट स्थित बावड़ी में “बावड़ी उत्सव” कार्यक्रम आयोजित किया गया।  इस अवसर पर परम पूज्य संत श्री भीमदेव जी आचार्य काशी विश्वनाथ वैदिक गुरुकुल एवं मां नर्मदा गौशाला जिलहरी घाट, गाजीपुर, परम पूज्य साध्वी मनीषा दीदी सिलपुरा आश्रम मंडला, श्री सी.एल. वर्मा संयुक्त कलेक्टर एवं राजेंद्र चौधरी जिला समन्वयक शामिल हुए। मां नर्मदा जी के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा जिला समन्वयक श्री राजेंद्र चौधरी ने रखी। संत श्री भीमदेव जी आचार्य ने कहा कि बावड़ियाँ वर्षा के पानी को एकत्रित करने और भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बनाई जाती थीं। शुष्क क्षेत्रों में, वे जल उपलब्धता में मौसमी उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद करते थे। इसी कड़ी में पूज्य साध्वी मनीषा दीदी ने कहा कि बावड़ियाँ सामाजिक मेलजोल के लिए एक जगह थीं, क्योंकि वे अपने आसपास के इलाकों की तुलना में ठंडी रहती थीं और लोगों को गर्मी से राहत मिलती थी। कार्यक्रम में महाराजपुर संगम घाट की प्राचीन बावड़ी को रंग रोगन, रंगोली, दीपों  एवं लाईट से सजाया गया, साथ ही उपस्थित अतिथियों द्वारा पूजन अर्चन किया गया तत्पश्चात मां नर्मदा जी की आरती कर प्रसाद वितरण किया गया। इस दौरान विकासखंड समन्वयक संतोष कुमार झारिया, अनिल कुमार मेहरा, श्रीमती कीर्ति कुरील, श्रीमती सीता उईके, कार्यालय स्टॉप शशि भूषण, बसंत नागेश्वर, समस्त मेंटर्स, समस्त छात्र-छात्राओं, समस्त नवांकुर संस्थाओं के प्रतिनिधिगण, प्रस्फुटन समितियों के प्रतिनिधिगण एवं स्थानीय शहर वासियों की उपस्थिति रही।

उन्नीसवीं शताब्दी में बनायी गयी थी महाराजपुर की बावड़ी

बाबडी का निर्माण कार्य ईस्वी सन 1890 का बताया जाता हैं, इस बावड़ी की संरचना ऐसी हैं कि इसमें नर्मदा जलधारा हमेशा बनी रहती हैं। जब इसका निर्माण हुआ उस समय हाथ से चलाने वाली मशीन लगी थी, मशीन की चकरी घुमाकर पानी पम्पिंग कर जमीन के ऊपर बने कुंयेनुमा टंकी पर चढ़ाया जाता था, फिर राजा के महल व बस्ती में भेजा जाता था। कालांतर में इसका उपयोग बगैर मशीन के होता रहा, रखरखाव व देखरेख के अभाव में लोगों ने इस बावड़ी को कूडादान बना दिया। म.प्र. जन अभियान परिषद के नेतृत्व में इस बावड़ी को श्रमदान कर साफ किया गया। संगम महाराजपुर की बावड़ी नर्मदा जी के किनारे पर हैं, गंगा दशहरा के पावन पर्व में संगम तट पर हजारों श्रद्धालु दर्शन-स्नान के लिये आते हैं।

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