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महान चित्रकार सैयद हैदर रज़ा की 10वीं पुण्यतिथि आज संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा में कला, साहित्य और नाट्य के अंतर्संबंधों पर हुआ मंथन

मंडला – गुरुवार को मंडला की माटी में आराम फरमा रहे मशहूर चित्रकार मरहूम सैयद हैदर रज़ा की 10वीं पुण्यतिथि पर उनके चाहने वाले श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। सुबह 10 बजे रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित रज़ा स्मृति के तहत विभिन्न कलाकार, साहित्यकार, कवी, शायर व उनके सभी चाहने वाले स्थानीय बिंझिया स्थित कब्रिस्तान पहुंचकर कर महान कलाकार को अपनी श्रद्धांजलि देंगे। बता दे कि कि सैयद हैदर रज़ा का लगभग 95 वर्ष की आयु में 23 जुलाई 2016 को दिल्ली में निधन हुआ था। उनकी इच्छा के मुताबिक उनके पार्थिव शरीर को मंडला लाकर उनके वालिद की कब्र के बगल में पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द ए खाक किया गया। तभी से रज़ा फाउंडेशन रज़ा साहब के जन्मदिवस व पुण्यतिथि में विभिन्न आयोजन करता आ रहा है।

रज़ा स्मृति 2026 के तहत होटल किंगफ़िशर में आयोजित संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा में कला, साहित्य और नाट्य के अंतर्संबंधों पर केंद्रित व्याख्यानमाला में विद्वानों ने विभिन्न कलाओं की साझा संवेदना और उनके दार्शनिक आधार पर विचार रखे। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने कहा कि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र केवल नाटक का ग्रंथ नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, अभिनय और अन्य कलारूपों की मूल अवधारणाओं का भी आधार-ग्रंथ है। भारतीय परंपरा में कलाओं का विकास परस्पर संबद्ध रहा है और नाट्यशास्त्र इसी समन्वित दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। अशोक वाजपेयी ने प्रश्न उठाया कि हमारे हिंदी समाज में सांप्रदायिकता के कारण क्या है? एक कारण कला से हमारा अपरिचय है।

प्रियंका दुबे ने अपने वक्तव्य में प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि के सूरदास चरित्र की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य में अनेक रचनाएँ अन्य कलाओं से गहरा संवाद स्थापित करती हैं। उन्होंने अज्ञेय की लंबी कविता असाध्य वीणा को संगीत की संवेदना से निर्मित काव्य बताया। इसी प्रकार संजीव की कहानी मानपत्र संगीत की दुनिया और कलाकार के अंतर्द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने मेरे राम का मुकुट भींग रहा है तथा ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये रचनाएँ भारतीय कलात्मक परंपरा और चौंसठ कलाओं की अवधारणा से संवाद करती हैं।

उदयन वाजपेयी ने कहा कि निश्चय ही ऐसी एक भाषा है जो सभी कलाओं में समान रूप से उपस्थित रहती है। चित्रकला, नृत्य, वाद्य-संगीत, गायन, कविता और नाट्य—सभी का अपना माध्यम अलग है, किंतु उनकी अंतःचेतना एक है। उन्होंने कहा कि मनोधर्म सभी कलाओं का समान धर्म है, जिसका उल्लेख नाट्यशास्त्र में मिलता है।

उन्होंने कहा कि यूरोप में लंबे समय तक यह धारणा रही कि कला का उद्देश्य सत्य का प्रतिपादन करना है, जबकि भारतीय परंपरा में कला के सत्य को विज्ञान के सत्य के समान महत्त्व प्राप्त है। भारतीय दृष्टि मानती है कि मनुष्य अपना सत्य लेकर जन्म लेता है। इसी कारण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की संगीत-साधना केवल संगीत सीखने का अभ्यास नहीं थी, बल्कि संपूर्ण सर्जक बनने की उनकी साधना थी।

उन्होंने कहा कि सभी कलाओं के संयोजन का आधार रस है। हबीब तनवीर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वे भी विभिन्न कलाओं का संयोजन रस के आधार पर करते थे। संगीत और चित्रकला में भी रस की उपस्थिति समान रूप से दिखाई देती है।

चित्रकला के संदर्भ में उन्होंने वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित चित्रकला के छह अंगों का उल्लेख किया—
“रूपभेदः प्रमाणानि भाव लावण्ययोजनम्।
सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रस्य षडङ्गकम्॥”

अर्थात् रूपों का भेद, उचित अनुपात, भावाभिव्यक्ति, लावण्य की योजना, सादृश्य तथा रंगों का विन्यास—ये चित्रकला के छह अनिवार्य अंग हैं। इनका समुचित निर्वाह होने पर ही चित्र पूर्ण माना जाता है।

उदयन वाजपेयी ने आगे कहा कि रस की अवस्था में रचनाकार अपने अहं का विसर्जन कर देता है। यही वह स्थिति है, जहाँ कला साधना का रूप धारण कर लेती है और सृजन व्यक्तिगत अनुभव से ऊपर उठकर सार्वभौमिक संवेदना में परिवर्तित हो जाता है।

इस संगोष्ठी में हस्तक्षेप का एक सत्र भी रखा गया था। इस सत्र मे सदानंद साही ने कहा कि साहित्य को पाँचों इन्द्रियों से ग्रहण किए जाने वाले अनुभवों—रस, रूप, गंध, स्पर्श और शब्द (ध्वनि)—का समुचित निर्वाह करना चाहिए। उनके अनुसार साहित्य तभी पूर्ण और प्रभावशाली बनता है, जब वह पाठक के समस्त इन्द्रियबोध और संवेदनात्मक अनुभव को स्पर्श कर सके।

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