मंडला. नवजात शिशु संवेदनशील होते हैं और उन्हें 9 महीने तक गर्भ की सुरक्षा में रहने के बाद अपने नए वातावरण में ढलना पड़ता है। विज्ञान और चिकित्सा जगत में हुई प्रगति ने डॉक्टरों को उसी समय से शिशु की स्थिति की जाँच करने की सुविधा प्रदान की है, जब उसका पहला अंग आकार लेना शुरू कर देता है। हालांकि, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद अच्छे स्वास्थ्य और किसी भी तरह की चिकित्सीय परिस्थितियों के बारे में जानने के लिए स्क्रीनिंग करना बहुत महत्वपूर्ण है।
बता दे कि अधिकांश शिशु स्वस्थ जन्म लेते हैं और स्वस्थ ही रहते हैं, लेकिन बहुत कम मात्रा में शिशु जन्म के समय स्वस्थ होने पर भी मेटाबोलिक गड़बड़ी के चलते बाद में बीमार हो जाते हैं। यदि इसका इलाज न किया जाएं तो यह जानलेवा भी हो सकता है। कुछ बच्चे जन्म से ही जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जन्म लेते हैं जैसे कि बधिरता या हृदय में कोई खराबी। सौभाग्य से कुछ बेहद आसान टेस्टों की मदद से इन जटिलताओं का जल्दी ही पता लगा लिया जाता है। इसके बाद इलाज करके इन खतरों को टाला जा सकता है। आरबीएसके अंतर्गत जिले में स्थित सभी प्रसव केन्द्रों में कार्यरत स्टाफ के चिकित्सक, एएनएम एवं नर्सो को जन्मजात विकृति की पहचान के लिये एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण जबलपुर से शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजया जायसवाल द्वारा दिया गया।
प्रशिक्षण की शुरूआत शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजया जायसवाल व जिला शीघ्र हस्तक्षेप प्रबंधक अर्जुन सिंह द्वारा की गई। प्रशिक्षण में उपस्थित चिकित्सक एएनएम और नर्स को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया गया। अर्जुन सिंह ने बताया कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत कौन-कौन सी बीमारियां आती है, जिसे हम आरबीएसके के अंतर्गत 0 से 18 वर्ष के बच्चों का नि:शुल्क इलाज करा सकते है। आरबीएसके के अंतर्गत 38 बीमारियों का नि:शुल्क ईलाज किया जाता है। यहां आरबीएसके टीम के द्वारा इनको चिन्हित कर इनका जांच परीक्षण के बाद उपचार कराया जाता है।
डॉ. विजया जायसवाल ने बताया कि डिलीवरी पॉइंट में जन्मे समस्त बच्चों का टॉप टू बॉटम स्क्रीनिंग किया जाना है एवं यह स्क्रीनिंग बर्थ डिफेक्ट्स मास्टर चार्ट एवं स्क्रीनिंग फॉर्म के अनुसार बच्चों की स्क्रीनिंग, पहचान, रेफरल एवं अर्ली मैनेजमेंट सही समय पर करके 70 परसेंट बर्थ डिफेक्ट के बच्चों को बचाया जा सकता है। प्रशिक्षण में सिविल सर्जन डॉ. केआर शाक्य ने बताया कि समस्त लाइव बर्थ में 6 से 7 प्रतिशत बच्चे बर्थ डिफेक्ट्स से ग्रसित पाय जाते है एवं सही समय में प्रबंधन करके चाइल्ड डेथ रेट को भी कम किया जा सकता है एवं डिलीवरी प्वाइंट में जन्मे समस्त बर्थ डिफेक्ट्स के बच्चों को आरसीएच पोर्टल के अनमोल एप में भी एंट्री किया जाना है।
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजया जायसवाल ने बताया कि जन्म लेने के तुरंत बाद बच्चे की संपूर्ण जांच के लिये कोम्प्रेहेंसिव न्यूबोर्न स्क्रीनिंग कराई जाती है। इस स्क्र्रीनिंग के बाद बच्चा किस विकृति या बीमारी से पीडि़त है इसका पता लगाया जा सकता है। जिसे हम बच्चे को एक बेहतर उपचार के माध्यम से स्वस्थ कर सकते है। यदि जन्म के तुरंत बाद इसकी पहचान नहीं की गई तो बच्चा विकृत या किसी अन्य गंभीर बीमारी से ग्रसित हो सकता है।
न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट की दी जानकारी:
डॉ. विजया जायसवाल ने बताया कि गर्भावस्था के शुरूआती चरण में जब भू्रण बढऩे लगता है, तब न्यूरल ट्यूब विकसित होता है जो आमतौर पर गर्भधारण के दो हफ़्तों के भीतर शुरू हो जाता है। यह ट्यूब एक छोटे से रिबन की तरह होता है जो बाद में ब्रेन स्पाइनल कॉर्ड और नसों में विकसित होता है। कुछ वजहों से यह न्यूरल ट्यूब असामान्यता विकसित करने लगता है जिसके परिणाम स्वरूप ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड और नसों के विकास में समस्याएं आने लगती हैं। महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करने वाले इस तरह के दोषों को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट कहते हैं। डॉ. जायसवाल ने फोर डी से संबंधित जानकारी दी। जिसमें अलग-अलग बीमारी और विकृति वाले बच्चों को चिन्हित किया जाता है। इस दौरान डिंडौरी जिला चिकित्सालय से आई स्टाफ नर्स आरती राय ने न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के अंतर्गत एक रोग का प्रिजेंटेशन करके दिखाया। उन्होंने बताया कि न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट से ग्रस्ति बच्चों को तुरंत कैसे उपचार दिया जाए। जिससे उसे बेहतर ईलाज के लिये रैफर कर सके।
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