मंडला, 3 जनवरी 2026
जब ग्रामीण अंचलों से आई कोई जरूरतमंद महिला आनंदम (दुआओं का घर) में प्रवेश करती है, तो वहाँ रखे बच्चों के कपड़ों को देखकर उसके चेहरे पर जो मुस्कान फैलती है, वह किसी उत्सव से कम नहीं होती। वह कपड़ों को हाथ में लेकर बार-बार देखती है, मानो अपने बच्चों की खुशियों को अपनी हथेलियों में समेट रही हो। उसी क्षण, उसके मुख से अनायास ही निकल पड़ते हैं ये शब्द या मोर चुन्नू-मुन्नू ला… या मोर बड़े दाऊ ला… अच्छा होही। ये शब्द साधारण नहीं होते। ये शब्द होते हैं-दिल से निकली दुआ। वह दुआ, जो बिना किसी औपचारिकता के सीधे ईश्वर तक पहुँचती है। कलेक्ट्रेट के समीप स्थापित आनंदम (दुआओं का घर) इसी की बानगी प्रस्तुत कर रहा है। अभी हाल ही में कैबिनेट मंत्री श्रीमती सम्पतिया उइके और प्रदेश के कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्यमंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री श्री दिलीप जायसवाल ने नए आनंदम भवन के लिए भूमिपूजन किया है।
कपड़े नहीं, सम्मान मिलते हैं
आनंदम में रखे ये वस्त्र सिर्फ़ कपड़े नहीं होते। ये किसी बच्चे को ठंड से बचाते हैं, किसी माँ के मन की चिंता हरते हैं और किसी परिवार को सम्मान के साथ जीने का हौसला देते हैं। जो कपड़े हमारे घरों में अलमारी की किसी शेल्फ़ पर बरसों से पड़े रहते हैं, वही कपड़े यहाँ किसी के जीवन की ज़रूरत बन जाते हैं।
तनिक विचार करें…
हम सब जानते हैं कि हम सबके घरों में ऐसी बहुत-सी चीज़ें होती हैं जो हमारी आवश्यकता से अधिक हैं। वे कपड़े जो अब पहनने में नहीं आते, वे खिलौने जिनसे अब हँसी नहीं गूँजती और वे जूते जो बस जगह घेरते हैं।
देने से खाली नहीं होते, भर जाते हैं
जब हम अपनी अतिरिक्त वस्तुएँ किसी ज़रूरतमंद तक पहुँचाते हैं, तो हम कुछ खोते नहीं बल्कि हम मानवता अर्जित करते हैं और बदले में हमें मिलती है वह दुआ, जो किसी माँ की आँखों से निकलकर सीधे दिल तक पहुँचती है या मोर चुन्नू-मुन्नू ला.. या मोर बड़े दाऊ ला… अच्छा होही।
यही सच्ची कमाई है
न धन,न प्रसिद्धि, बल्कि किसी अनजान माँ की सच्ची दुआ यही सबसे बड़ी संपत्ति है।
