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नरवाई प्रबंधन जागरूकता में कारगर साबित हैप्पी सीडर से बोनी

मंडला, 15 दिसंबर 2025

कृषि अभियांत्रिकी विभाग के माध्यम से प्रदर्शन कर हैप्पी सीडर यंत्र की सहायता से विकासखंड नैनपुर के ग्राम समनापुर के प्रगतिशील कृषक श्री ऋषि ठाकुर ने न केवल अपनी खेती की लागत को कम किया, बल्कि इस वर्ष उन्हें अधिक उत्पादन और मुनाफे की भी उम्मीद है। कृषि अभियांत्रिकी विभाग से सहायक कृषि यंत्री, मण्डला श्रीमती प्रियंका मेश्राम एवं उपयंत्री श्रीमती भावना मरावी ने बताया कि किसान श्री ऋषि ठाकुर पहले खेतों में खड़ी नरवाई को जलाते थे, जिससे जमीन की उर्वरता कम होती थी और प्रदूषण भी फैलता था। विभाग द्वारा हैप्पी सीडर से खेत में गेंहू की बोनी का प्रदर्शन किया गया।

कृषक श्री ऋषि ठाकुर ने बताया कि परम्परागत तरीके से बोनी में मुझे खेत की तैयारी में दो बार कल्टीवेटर चलाना पड़ता था और कभी-कभी जरूरत पड़ने पर तीन बार भी चलाना पड़ता था। इस प्रकार एक एकड़ खेत की तैयारी में लगभग 2400-3600 रूपए खर्चा आता था। इसके बाद बीज को छिड़क्कर के उसमें दो बार कल्टीवेटर चलाना पड़ता था। ताकि बीज मिट्टी में अच्छे से मिल जाये जिसमें लगभग 2400 रूपये खर्चा आता था। परंपरागत विधि में बीज की मात्रा भी 60 कि.ग्राम. के लगभग लगती थी जो कि मानदंड से अधिक थी तथा खाद 50 कि.ग्रा. के लगभग लगती थी। इस परम्परागत छिड़का पद्धति से बोनी करने का एक दुष्परिणाम यह भी था कि इसमें खरपतवार भी अधिक उगता था। जिसकी सफाई में 3 से 5 मजदूर आवश्यकता अनुसार एक दिन के लिए एक एकड़ में लगते थे तथा इससे 600 से 1000 रूपये का खर्च अतिरिक्त बढ़ जाता था। इस प्रकार खेत की तैयारी, बीज, खाद, बीज को मिट्टी में मिलाना, खरपतवार की सफाई आदि खर्च जोड़कर 1 एकड़ में पूरी बोनी की लागत खर्च 10 से 12 हजार रूपये होती थी। साथ ही श्रम व समय भी अधिक लगता था।

हैप्पी सीडर कृषि यंत्र बोनी करने में खेत में जो नरवाई या घास लगी होती है उसे काटकर वह मिट्टी के उपर बिछा देता है। जिससे नरवाई मल्चिंग का कार्य करती है एवं बाद में नरवाई सड़कर खाद बन जाती है। यह यंत्र एक ही बार में नरवाई को काटकर बोनी कार्य कर देता है, अर्थात् नरवाई प्रबंधन, खेत की तैयारी, बोनी यह तीनों कार्य एक ही समय में व एक ही बार में करके श्रम, समय व लागत में बचत करता है, जिससे अधिक से अधिक बीज का अंकुरण होता है व इससे बोनी में बीज की मात्रा भी कम लगती है तथा उत्पादन भी अच्छा होता है। इस विधि से परंपरागत पद्धति की तुलना में लगभग 25 से 30 प्रतिशत अधिक उत्पादन होता है तथा खरपतवार को भी नियंत्रित करता है। चूंकि इस विधि में नरवाई को काटकर मिट्टी में दबा देने से वह खाद बन जाती है जिससे बोनी के समय खाद भी कम लगती है। जो कि परंपरागत तरीके से डाले जाने वाली खाद की मात्रा से 30 से 40 प्रतिशत कम लगती है, अर्थात् 30 कि.ग्रा. प्रति एकड़ लगती है। इस यंत्र की वजह से एक एकड़ में बोनी का खर्च खाद, ट्रेक्टर यंत्र मिलाकर लगभग 2000 रूपये आता है। जो कि परंपरात तरीके से बोनी के खर्च से लगभग आधा है। वहीं दूसरी ओर उत्पादन पूर्व विधि से 25 से 30 प्रतिशत अधिक अर्थात प्रत्येक एकड़ में 5 से 6 क्विंटल अधिक उत्पादन होता है। मशीन की कीमत लगभग 1.72 लाख रूपये एवं अनुदान की अधिकतम राशि 82 हजार रूपये है। उक्त मशीन कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा अनुदान पर https://dbt.mpdage.org पोर्टल के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है। कृषकों द्वारा उक्त मशीन के प्रदर्शन को सराहा गया एव कृषकों ने मशीन खरीदने की बात कही।

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