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आदि उत्सव विशेष: रामनगर के ऐतिहासिक महलों में जीवित है गोंडवाना का गौरवशाली इतिहास 17वीं शताब्दी के मोती महल से चौगान मढ़िया तक आस्था और स्थापत्य की अनूठी गाथा

मंडला, 14 मई 2026

नर्मदा नदी के पावन तट पर बसे रामनगर की ऐतिहासिक धरोहरें आज भी गोंडवाना साम्राज्य के वैभव, सांस्कृतिक समन्वय और स्थापत्य कला की अद्भुत कहानी कहती हैं। 17वीं शताब्दी में गोंड राजा हृदय शाह द्वारा निर्मित महल परिसर और चौगान मढ़िया न केवल तत्कालीन शासन व्यवस्था के प्रतीक हैं, बल्कि जनजातीय समाज की आस्था और गौरव के केंद्र भी हैं।

आदि उत्सव के अवसर पर यह ऐतिहासिक परिसर गोंड संस्कृति, परंपरा और विरासत की स्मृतियों को पुनः जीवंत कर देता है।

रामनगर: गोंड राजधानी का रणनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र

 

बुंदेला आक्रमणों के कारण चौरागढ़ की सुरक्षा कमजोर पड़ने लगी थी। ऐसी परिस्थिति में राजा हृदय शाह ने वर्ष 1651 से 1667 ईस्वी के मध्य नर्मदा नदी के सुरक्षित तट पर रामनगर को नई राजधानी के रूप में विकसित किया।

रामनगर का चयन केवल सुरक्षा की दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहां निर्मित भवनों में गोंड, मुगल और राजपूत स्थापत्य शैली का अनूठा संगम दिखाई देता है। विशाल प्रांगण, मेहराबदार द्वार, गुंबद, जल संरचनाएं और पत्थर की कलात्मक नक्काशी तत्कालीन वास्तुकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।

यह पूरा परिसर उस समय गोंड साम्राज्य की प्रशासनिक, सैन्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

मोती महल: गोंड राजवंश की वंशावली का ऐतिहासिक साक्षी

 

नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित तीन मंजिला मोती महल रामनगर का सबसे भव्य और प्रमुख राजमहल माना जाता है। सुरक्षा और सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण यह महल विशाल वर्गाकार आंगन और बावड़ी के चारों ओर निर्मित है।

इस महल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता वह ऐतिहासिक शिलालेख है, जिसमें गढ़ा-मंडला के 54 गोंड राजाओं की वंशावली अंकित है। यह शिलालेख गोंड साम्राज्य के इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार इस महल का निर्माण अत्यंत कम समय में हुआ था, जिसके कारण इसके निर्माण को लेकर तंत्र-मंत्र और रहस्यमयी कथाएं भी प्रचलित हैं। आज भी यह महल गोंडवाना साम्राज्य की समृद्धि और स्थापत्य कौशल का प्रतीक बना हुआ है।

बेगम महल: प्रेम, स्थापत्य और सांस्कृतिक समन्वय की अनूठी धरोहर

 

बेगम महल का निर्माण राजा हृदय शाह ने अपनी प्रिय रानी चिमनी बेगम की स्मृति में कराया था। मान्यता है कि मुगल दरबार में प्रवास के दौरान राजा हृदय शाह का परिचय एक मुगल राजकुमारी से हुआ, जिन्हें बाद में रानी चिमनी देवी के रूप में जाना गया।

काले पत्थरों से निर्मित यह तीन मंजिला आयताकार महल इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। महल के चारों कोनों पर बने गुंबददार कक्ष, मेहराबदार छतें और जलाशय की ओर उतरती सीढ़ियां इसकी सुंदरता को और आकर्षक बनाती हैं।

इतिहास में हुए आक्रमणों के दौरान इस महल के खजाने को लूट लिया गया था, किंतु आज भी इसकी स्थापत्य भव्यता लोगों को आकर्षित करती है। वर्तमान में यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है तथा यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में भी शामिल किया गया है।

राय भगत की कोठी: सममित स्थापत्य और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रतीक

 

मोती महल से लगभग एक किलोमीटर दूर नर्मदा तट पर स्थित राय भगत की कोठी राजा हृदय शाह द्वारा अपने विश्वस्त दीवान राय भगत के लिए निर्मित कराई गई थी।

यह दो मंजिला भवन अपनी सममित वास्तु योजना के लिए प्रसिद्ध है। महल के चारों कोनों पर बने सुंदर गुंबद और मध्य भाग में स्थित वर्गाकार जलकुंड इसकी स्थापत्य विशेषता हैं। मुख्य द्वार की छत पर की गई रंगीन नक्काशी गोंड और मुगल कला शैली के सुंदर समन्वय को दर्शाती है।

मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग ने वर्ष 1984 में इसे राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया था। यह भवन तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था और राजकीय संरचना का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

दलबादल महल: गोंड सेना की सैन्य शक्ति का प्रतीक

 

दलबादल महल का उपयोग मुख्य रूप से गोंड सेना के सेनापतियों और सैनिकों के विश्राम स्थल के रूप में किया जाता था। इसकी संरचना साम्राज्य की सैन्य तैयारियों और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

 

यह महल उस समय की संगठित सैन्य व्यवस्था, सैनिक अनुशासन और रणनीतिक सोच का प्रतीक माना जाता है। इसके निर्माण में सुरक्षा को विशेष महत्व दिया गया था।

चौगान मढ़िया: जनजातीय आस्था और परंपरा का पवित्र तीर्थ

 

रामनगर के ऐतिहासिक महलों के समीप स्थित चौगान मढ़िया आदिवासी और जनजातीय समाज की गहरी आस्था का केंद्र है। इसे गढ़ा-मंडला के गोंड राजवंश की कुलदेवी का स्थान माना जाता है।

मान्यता है कि राजा हृदय शाह किसी भी युद्ध, अभियान अथवा शुभ कार्य से पहले यहां आकर आशीर्वाद प्राप्त करते थे। पत्थरों के मजबूत परकोटे से सुरक्षित यह मढ़िया आज भी राजकीय मड़ई उत्सव और जनजातीय परंपराओं का प्रमुख केंद्र है।

यहां प्रज्वलित पवित्र धूनी को कष्ट निवारक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु नौ दिनों तक सफेद वस्त्र धारण कर सेवा और साधना करते हैं। हजारों ज्योति कलश और जवारे नर्मदा नदी में विसर्जित किए जाते हैं, जो जनजातीय संस्कृति और आस्था का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

विरासत संरक्षण और आदि उत्सव का संदेश

 

रामनगर का यह ऐतिहासिक परिसर केवल पत्थरों से निर्मित भवनों का समूह नहीं, बल्कि गोंडवाना साम्राज्य की सांस्कृतिक चेतना, स्थापत्य प्रतिभा और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है।

आदि उत्सव के अवसर पर यह विरासत हमें अपनी जड़ों, परंपराओं और इतिहास से जुड़ने का संदेश देती है। गोंड शासकों ने जिस समावेशी शासन, कला संरक्षण और सांस्कृतिक एकता की परंपरा को स्थापित किया, वह आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।

रामनगर की यह गौरवगाथा आने वाली पीढ़ियों को अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और जनजातीय संस्कृति के सम्मान का संदेश देती रहेगी।

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