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खरीफ फसलो में गुणवत्ता युक्त अधिक उत्पादन हेतु समसामियिक सलाह जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला

वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डाॅ. विषाल मेश्राम ने किसान बंधुओ को आगामी खरीफ मौसम में फसलों का अधिक गुणवत्ता पूर्ण उत्पादन प्राप्त करने के लिए सुझाव देते हुये अनुरोध किया है कि 3 वर्ष के अंतराल पर मृदा नमूना संग्रह-पलटने वाले हल से ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें जिससे भूमि की कडी परत टूटने से मृदा में जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है तथा मिट्टी में हानिकारक खरपतवारों कीट-व्याधियों के अवषेष नष्ट होते हैं। मेढ-बंधान, समतलीकरण, तालाबों का सुधार व गहरीकरण करें जिससे वर्षा जल संचय अधिक हो सके। फसल अवषेषों में आग नही लगायें बल्कि भूसा तैयार करें तथा जुताई कर खेत में जीवांष पदार्थ की मात्रा बढायें। मिटटी परीक्षण हेतु खेत की मिटटी का नमूना 500 ग्रा. एकत्रित कर उपयुक्त जानकारी पत्रक भरके परीक्षण हेतू मिट्टी परीक्षण प्रयोगषाला मे जमा करे। हमेषा मिट्टी परीक्षण उपरांत अनुषंसित खाद की मात्रा का ही प्रयोग करे। जिससे लागत में कमी और मिटटी की सेहत में वृद्धि होती है। मक्का की संकर या देषी प्रजाति की बोनी मानसून को देखते हुये 15-30 जून तक 3-5 तक ही गहराई में ही करे। जल्दी पकने वाली किस्मों में कतार से कतार की दूरी 60 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 20 से.मी. रखें। इसी प्रकार खरीफ फसल उत्पादन के लिए योजनाबद्ध तकनीक अपनाये जिसमें स्वयं के द्वारा उत्पादित बीजों, मंूग-उडद, सोयाबीन की स्पाइरल सेपरेटर से सफाई, मूंगफली बीज छिलाई तथा घरेलू स्तर पर बीज परीक्षण कर बीज की गुणवत्ता में सुधार करे। फसल एवं उनकी किस्मों में विविधता रखें जिससे वर्षा स्थिति के अनुसार फसल प्रबंधन लाभकारी हो सकें। सब्जी फसलों जैसे टमाटर मिर्च, बैगन इत्यादि के लिए नर्सरी का शौर्य (तेज धूप) उपचार करे। जिससे हानिकारण फफूंद-चक्र व प्रबंधन तकनीक अंतर्गत फसलों का चयन करे। कददू वर्गीय फसलों की बुवाई की तैयारी करे। तथा गर्मियो में बोई गई सब्जियां तथा फसलों मूंग, उडद इत्यादि फसलों मे सिंचाई सुबह या शाम के समय करे। जिससे फसलों पर लाभकारी प्रभाव ज्यादा बना रहे। यदि फसल पक कर तैयार हो गई हो तो शीघ्र कटाई करके गहाई करे। धान फसल के लिए अधिक उत्पादन वाली किस्में जैसे एमटीयू 1010, जेआर81, जेआर206, जेआरबी1, जेआर201, सुंगधित धान में पूसा सुगंधा 3, पूसा सुगंधा 4, अधिक जल भराव वाले खेतों जहाॅ जल भरे होने के कारण फसलें लेना लाभ दायक न हो वहाॅ अधिक जल सहन करने वाली धान की किस्मों सहभागी, दंतेष्वरी आदि लगाई जा सकती हैं। अतः इनके बीज की अभी से व्यवस्था करे। मानसून को देखते हुये जून के तृतीय सप्ताह तक रोपा पद्धती से लगाने वाले किसान भाई अपनी रोपणी आवष्यक रूप से तैयार करने जिससे समय पर रोपा लगाया जा सकें। धान में बाली अवस्था में झूठा कंडवा ख् थ्ंसेम ेउनज , एक फफूंदीजनक रोग आता है उसकी रोकथाम हेतु फंफूदी नाषक दवा कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज की सहायता से बीज उपचार करे। धान की रोपणी में रोपा लगाने के एक सप्ताह पूर्व कीट नाषक दवा क्लोरोपाईरीफाॅस 40-50 मी.ली. प्रति पम्प की दर से छिडकाव करें। इससे धान में 1-2 महीनो में लगने वाले कीट तना छेदक व गंगई/पोंगा से रोकथाम हो जाता है। साथ ही जैविक कल्चर जैसे पी.एस.बी, एजोटोबेक्टर से 5-5 ग्राम प्रति कि.ग्रा बीज की दर से बीज उपचारित करे। अरहर की बुआई के पूर्व बीज उपचार वीटा वेक्स पाॅवर 2 ग्राम प्रति किलो बीज अथवा कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज एवं ट्राईको डरमा विरडी 5 ग्राम प्रति किलों बीज की दर से बीज उपचार करे। जिससे इनमें लगने वाले उकटा रोग से रोक थाम हो जाती है। साथ ही अनुरोध है कि कोरोना संक्रमण से बचाव करें जिसमें अकारण/बेवजह बाहर नही जाये तथा उचित दूरी तथा मास्क का प्रयोग जरूर करे और समय-समय पर हाथों को साबुन से धोएं तथा सैनेटाईजर भी करे। शासन/जिला प्रषासन के कोविड-19 निर्देषों का पालन कडाई से करें और कराने में अपना सहयोग देंवे।

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